
विशेष रिपोर्ट | लेखक: आपका प्रिय पोपट लाल
भूमिका
भारत की धरती ने एक बार फिर ऐसा कमाल कर दिखाया है कि सिलिकॉन वैली के इन्वेस्टर्स की नींद उड़ गई है। भारतीय स्टार्टअप ‘टेकनोवेट’ को सीधे $100 मिलियन (यानी कि पूरे 825 करोड़ रुपये!) का निवेश मिला है। इस खबर से स्टार्टअप की दुनिया में हड़कंप मच गया है। कुछ लोगों को इसमें देश की प्रगति दिख रही है, तो कुछ को इसमें एक नया ‘बबल’ फूटने की आहट सुनाई दे रही है।
आज हम इस ऐतिहासिक घटना की विवेचना करेंगे और जानेंगे कि कैसे ‘टेकनोवेट’ ने दुनिया को अपने इनोवेशन से चौंका दिया और कैसे इस खबर ने भारत में चाय की दुकानों से लेकर यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स तक को हिला कर रख दिया।
‘टेकनोवेट’ का ऐतिहासिक सफर – कैसे शुरू हुआ यह सफर?
‘टेकनोवेट’ की शुरुआत तीन युवा उद्यमियों ने एक छोटे से कमरे में बैठकर की थी। कमरे में बस एक पुराना लैपटॉप, टूटे-फूटे कुर्सियाँ और दीवारों पर ‘थिंक बिग’ और ‘ड्रीम बिग’ जैसे स्लोगन लिखे हुए थे। उनकी जेब में पैसे भले न हों, लेकिन आइडियाज की कोई कमी नहीं थी।
‘टेकनोवेट’ के संस्थापकों का कहना था:
“हमने सोचा कि अगर लोग रोज़ नए-नए स्टार्टअप बना सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? हम भी एक ऐसी टेक्नोलॉजी बनाएंगे, जो दुनिया में तहलका मचा देगी। फिर हमने दो रातों की कड़ी मेहनत और तीन पैकेट मैगी के साथ एक पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन तैयार कर लिया। और फिर सिलिकॉन वैली की ओर कूच कर गए।”
यानी कि न कोई प्रोडक्ट, न कोई सर्विस – बस एक धांसू आइडिया और उससे भी धांसू पीपीटी। और इतिहास गवाह है कि भारतीयों का पीपीटी प्रेम ही उन्हें निवेशकों का चहेता बनाता है!
सिलिकॉन वैली इन्वेस्टर्स का ‘मोह’ – 100 मिलियन डॉलर क्यों?
अब सवाल उठता है कि आखिर अमेरिकी निवेशकों ने ‘टेकनोवेट’ में इतना पैसा क्यों लगाया? जवाब बहुत सरल है – उन्हें भारतीय टेक्नोलॉजी में ‘जादू’ दिखता है!
जब ‘टेकनोवेट’ के फाउंडर्स ने अपनी प्रेजेंटेशन में बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग किया – जैसे AI, Blockchain, Quantum Computing, Decentralized System, Next-Gen Innovation – तो इन्वेस्टर्स ने बिना कुछ समझे ही चेकबुक निकाल ली।
एक सिलिकॉन वैली इन्वेस्टर ने कहा:
“हम भारतीय स्टार्टअप्स में निवेश करना पसंद करते हैं, क्योंकि ये लोग अपने पिच डेक में ऐसे-ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, जिनका मतलब हमें भी नहीं पता होता। इससे हमें लगता है कि यह स्टार्टअप वाकई में फ्यूचरिस्टिक है!”
यानी कि अगर आप अपने स्टार्टअप की प्रेजेंटेशन में ‘Quantum Neural Network-based AI-driven Web 3.0 Blockchain Platform’ जैसे भारी-भरकम शब्द जोड़ दें, तो आपको भी 100 मिलियन डॉलर मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
भारतीय स्टार्टअप कल्चर – ‘हर कोई सीईओ’
इस खबर के बाद भारत में स्टार्टअप की लहर और तेज़ हो गई है। अब हर गली-मोहल्ले में लोग अपने-अपने स्टार्टअप आइडिया लेकर घूम रहे हैं।
- चायवाले का नया स्टार्टअप: AI-Based Personalized Tea Recommendation System
- पानवाले का नया स्टार्टअप: Blockchain-secured Betel Leaf Trading Platform
- ऑटोवाले का नया स्टार्टअप: Decentralized Ride-Sharing using AI
यानि अब हर कोई किसी न किसी ‘AI’ और ‘Blockchain’ से जुड़ना चाहता है, क्योंकि निवेशकों को यही पसंद है।
निवेश के बाद ‘टेकनोवेट’ की टीम – आलीशान दफ्तर और ऊँची उड़ान
जैसे ही ‘टेकनोवेट’ को 100 मिलियन डॉलर मिले, उनकी टीम में बड़ा बदलाव आया। अब पुराने टूटे-फूटे ऑफिस की जगह बेंगलुरु के सबसे महंगे इलाके में नया ऑफिस बन चुका है।
नए ऑफिस की खासियतें:
- हर फ्लोर पर PS5 और गेमिंग ज़ोन
- हाई-टेक एर्गोनॉमिक चेयर (काम के लिए नहीं, इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए)
- फ्री अनलिमिटेड कॉफी (क्योंकि स्टार्टअप वाले कॉफी के बिना नहीं जी सकते)
- हफ्ते में दो बार DJ नाइट
अब ‘टेकनोवेट’ में हर कोई ‘चीफ’ बन चुका है।
- सीईओ (Chief Executive Officer)
- सीटीओ (Chief Technology Officer)
- सीएमओ (Chief Meme Officer)
- सीएचओ (Chief Happiness Officer – जो कर्मचारियों को मोटिवेट करने के लिए Inspirational Quotes भेजता है)
टेकनोवेट के कर्मचारी – मेहनत या सिर्फ मीटिंग्स?
अब जब कंपनी को इतना बड़ा फंड मिला है, तो कर्मचारियों को भी उसी हिसाब से काम करना चाहिए। लेकिन असली स्टार्टअप कल्चर क्या है?
- मीटिंग्स पर मीटिंग्स: कंपनी में हर प्रोजेक्ट पर इतनी मीटिंग्स होती हैं कि काम करने का समय ही नहीं बचता।
- कंप्यूटर स्क्रीन पर कोडिंग नहीं, बल्कि स्टॉक मार्केट: कर्मचारी स्टार्टअप के IPO का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे अपने शेयर बेचकर खुद भी स्टार्टअप खोल सकें।
- LinkedIn पर सेलिब्रिटी बनने की होड़: कंपनी के हर कर्मचारी ने अपने प्रोफाइल में लिखा है – “Building the future with AI & Blockchain”।
100 मिलियन डॉलर का भविष्य – बबल फटेगा या असली इनोवेशन?
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि ‘टेकनोवेट’ का भविष्य क्या होगा?
- क्या वे सच में कोई इनोवेटिव टेक्नोलॉजी बनाएंगे?
- या फिर 2-3 साल बाद ‘फंडिंग खत्म’ होने के बाद कंपनी बंद हो जाएगी?
- या फिर टेकनोवेट भी ‘WeWork’ जैसी कहानी दोहराएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में 90% स्टार्टअप्स 5 साल में बंद हो जाते हैं। लेकिन जब तक ‘टेकनोवेट’ के पास 100 मिलियन डॉलर हैं, तब तक पार्टी जारी रहेगी!
निष्कर्ष – सीख क्या है?
इस पूरे मसले से हमें कई चीजें सीखने को मिलती हैं:
- अगर आपको फंडिंग चाहिए, तो पहले धांसू प्रेजेंटेशन बनाइए।
- AI और Blockchain जैसे शब्द हर जगह डालिए – इन्वेस्टर्स को बहुत पसंद आते हैं।
- स्टार्टअप में असली काम कम, मीटिंग्स और कॉफी ज्यादा जरूरी होती है।
- IPO ही स्टार्टअप कल्चर का ‘मोक्ष’ है।
तो दोस्तों, अगली बार जब आपके मन में कोई स्टार्टअप आइडिया आए, तो बिना झिझक उसे ‘AI & Blockchain-based’ बना दीजिए। क्या पता, अगला 100 मिलियन डॉलर का चेक आपका ही इंतजार कर रहा हो!
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