भ्रामक चिकित्सा विज्ञापन: दवा से ज्यादा दावा!


परिचय: डॉक्टर या जादूगर?

भारत में मेडिकल साइंस जितना विकसित हुआ है, उससे कहीं ज्यादा तेज़ी से भ्रामक चिकित्सा विज्ञापन (False Medical Ads) फैले हैं। आपको हर नुक्कड़, बस स्टैंड, दीवार और बिजली के खंभे पर ऐसे पोस्टर मिल जाएंगे –

“100% गारंटी से बालों का इलाज!”
“मर्दानगी की समस्या का रामबाण इलाज!”
“घर बैठे मोटापा गायब!”

अरे भाई, अगर ये सब सही होता तो AIIMS और Apollo बंद हो गए होते! डॉक्टर MBBS करने की बजाय कोई बाबा बनकर ‘चमत्कारी तेल’ बेच रहे होते!

लेकिन जनता भी मज़ेदार है। एक तरफ ये लोग विज्ञान की पढ़ाई को मुश्किल बताते हैं, दूसरी तरफ बिना किसी प्रमाण के जड़ी-बूटी, ताबीज और “चमत्कारी शक्तियों” पर भरोसा कर लेते हैं।


DMR अधिनियम 1954: एक भूला-बिसरा कानून

सरकार ने 1954 में “ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम” बनाया था। इसका सीधा मतलब था कि कोई भी झूठे और भ्रामक दावे नहीं कर सकता, खासकर चिकित्सा क्षेत्र में। लेकिन समस्या ये है कि यह कानून सिर्फ सरकारी फाइलों में धूल खा रहा है।

आपको यह जानकर हंसी आएगी कि इस कानून के तहत आज तक जितने लोग पकड़े गए हैं, उससे ज्यादा तो सोशल मीडिया पर “ग्लोइंग स्किन” वाले नकली प्रोडक्ट्स बिक रहे हैं।

सरकार कहती है कि कानून का पालन करना जनता और कंपनियों की ज़िम्मेदारी है। अब बताइए, कोई ठग खुद कब मान लेता है कि वो ठग है?


‘100% गारंटी वाला इलाज’ का सच

अगर किसी बीमारी का कोई वैज्ञानिक इलाज नहीं मिला, तो टेंशन मत लीजिए। भारत में हर नुक्कड़ पर आपको “100% असरदार दवा” बेचने वाले मिल जाएंगे। ये लोग ऐसे दावे करते हैं, मानो WHO और FDA के वैज्ञानिक इनसे ट्रेनिंग लेने आते हों।

  • “सिर्फ 7 दिनों में सफेद बाल को काला बनाएं!”
    (तो फिर हेयर डाई कंपनियां क्या कर रही हैं?)
  • “मर्दानगी बढ़ाने वाली 5000 साल पुरानी जड़ी-बूटी!”
    (5000 साल पुरानी चीज़ अब तक खराब नहीं हुई?)
  • “सिर्फ 3 दिन में डायबिटीज खत्म!”
    (डॉक्टर जो 10 साल से रिसर्च कर रहे हैं, उन्हें बुलाकर बताना चाहिए!)

लेकिन जनता इन विज्ञापनों पर ऐसे यकीन करती है, जैसे WhatsApp यूनिवर्सिटी से PHD की हो।


न्यायालय की फटकार और सरकारों की झपकी

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को फटकार लगाई कि इस कानून का ठीक से पालन क्यों नहीं हो रहा। लेकिन सरकारी विभागों की कार्यशैली ऐसी है कि अगर वे “तुरंत कार्रवाई” का वादा करें, तो उसका मतलब है कि कम से कम 5 साल का इंतजार करना होगा।

सरकार के लिए ये विज्ञापन तब तक समस्या नहीं हैं, जब तक कोई मंत्री खुद इनसे ठगा न जाए।


जनता बेचारी, ठग खिलाड़ी

किसी को इलाज की ज़रूरत हो तो वह डॉक्टर से मिलने से पहले गूगल और व्हाट्सएप पर रिसर्च करता है। फिर अगर कोई “बाबा” उसे 500 रुपये में “100% असरदार” दवा देने की बात करे, तो वह डॉक्टर की 1000 रुपये की फीस बचाने के लिए ठगी का शिकार हो जाता है।

समस्या यह नहीं है कि ठग बहुत तेज़ हैं, बल्कि यह है कि जनता बहुत भोली है। यही कारण है कि ये नकली विज्ञापन आज भी धड़ल्ले से चलते हैं।


निष्कर्ष: ठगी से बचें, विज्ञान को समझें!

जब तक जनता खुद जागरूक नहीं होगी, तब तक ये नकली इलाज और भ्रामक विज्ञापन बंद नहीं होंगे। अगली बार जब कोई “100% असरदार” दावा करे, तो पूछिए –

“भाई, अगर सच में इतना बढ़िया इलाज है तो डॉक्टर क्यों परेशान हैं? ये दवा WHO को क्यों नहीं बेची?”

इसलिए दोस्तों, नकली विज्ञापन और ठगों से बचिए, विज्ञान और सच्चे डॉक्टरों पर भरोसा कीजिए। वरना कहीं ऐसा न हो कि बालों का इलाज करवाने जाएं और सिर पर बाल की जगह खरपतवार उग आए!


(नोट: यह लेख पूरी तरह व्यंग्यात्मक है और किसी विशेष व्यक्ति या संस्था पर निशाना नहीं साधता। बस जनता को जागरूक करने का प्रयास है!)

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