वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025: संसद में 14 घंटे की ‘महाभारत’, विपक्ष के तंज और सरकार की ‘ट्रांसपेरेंसी’ की ट्यूशन!

भारतीय संसद में शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025 की भोर में एक ऐतिहासिक क्षण आया जब लगभग 14 घंटे की बहस के बाद वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 को पारित कर दिया गया। यह विधेयक 128 मतों के समर्थन और 95 मतों के विरोध के बावजूद पारित हुआ, और उसके बाद से सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई है। लोग यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर सरकार को अचानक वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने की इतनी जोरदार प्रेरणा कहां से मिली?

संसद में गर्मागर्म बहस और कुर्सियों की बची इज़्ज़त

राज्यसभा में जब इस विधेयक पर चर्चा शुरू हुई, तो विपक्ष के सांसदों ने काले कपड़े पहनकर इसका विरोध किया। कुछ सांसदों ने तो यह भी सोच लिया था कि अगर बहस ज्यादा लंबी खिंच गई, तो रात का खाना भी संसद की कैंटीन में ही खाना पड़ेगा।

कांग्रेस सांसद सैयद नसीर हुसैन ने सरकार पर आरोप लगाया कि यह कानून मुसलमानों को “द्वितीय श्रेणी का नागरिक” बनाने की साजिश है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सरकार वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को शामिल कर सकती है, तो क्या वह उन्हें मंदिरों के ट्रस्ट में भी सदस्य बना सकती है? इस पर संसद में अचानक सन्नाटा छा गया, जैसे किसी ने TV डिबेट में ब्रेक के दौरान माइक बंद कर दिया हो।

सरकार की सफाई और तर्क-वितर्क की रेसलिंग

केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने आश्वासन दिया कि यह विधेयक पूरी तरह से पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लाया गया है और इसका किसी भी धार्मिक समुदाय के खिलाफ कोई इरादा नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्य सिर्फ “योगदान देने” के लिए होंगे, वे फैसले नहीं लेंगे।

इसपर विपक्षी सांसदों ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा, “तो क्या वे सिर्फ कॉफी पिलाने और मिनिट्स लिखने के लिए रहेंगे?” इस पर सत्ताधारी पक्ष के कई सांसदों की हंसी छूट गई, लेकिन सरकारी पक्ष ने गंभीर चेहरा बनाए रखा, क्योंकि व्यंग्य समझने के लिए थोड़ा दिमाग भी चाहिए होता है।

विपक्ष के हमले और सरकार की काउंटर अटैक

राज्यसभा में नेता सदन और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि इस विधेयक पर सवाल उठाने वालों ने ही पहले मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक कानून के जरिए “द्वितीय श्रेणी की नागरिक” बना दिया था। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत से पहले कई मुस्लिम देश अपने वक्फ कानूनों में बदलाव कर चुके हैं, लेकिन भारत में हर बदलाव को धार्मिक रंग देने की परंपरा बन चुकी है।

शिवसेना (उद्धव गुट) के सांसद संजय राउत ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार द्वारा मुसलमानों की चिंता करना देखकर तो जिन्ना की आत्मा भी शर्म से पानी-पानी हो रही होगी। वहीं, आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य मुसलमानों की संपत्तियों को नियंत्रित करना है, जबकि अन्य धार्मिक ट्रस्टों में ऐसा कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाता।

बिल के पक्ष-विपक्ष में सवाल-जवाब का दौर

कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने एक और रोचक सवाल उठाया, “अगर तिरुपति मंदिर बोर्ड में गैर-हिंदू नहीं हो सकते, तो वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम कैसे हो सकते हैं?” इस पर सत्ता पक्ष ने जवाब देने की बजाय दूसरे मुद्दे की ओर ध्यान मोड़ लिया, क्योंकि इसका जवाब देना उतना ही कठिन था जितना कि बिना देखे लूडो में 6 का आंकड़ा निकालना।

समाजवादी पार्टी के सांसद जावेद अली खान ने सरकार के दावे पर कटाक्ष करते हुए कहा, “वक्फ संपत्तियों का 60% हिस्सा कब्रिस्तानों में है, और कब्रिस्तानों में जो भी कारोबार होता है, वह मरने के बाद ही संभव है।” इस तंज ने सदन में बैठे सांसदों को असमंजस में डाल दिया कि इसे हंसी में लिया जाए या गंभीरता से।

विपक्ष का आरोप: असली मुद्दों से भटकाने की चाल

AAP सांसद संजय सिंह ने इस विधेयक पर सवाल उठाते हुए सरकार पर मंदिर संपत्तियों में हो रहे घोटालों को अनदेखा करने का आरोप लगाया। उन्होंने अयोध्या में हुए 13,000 एकड़ भूमि घोटाले का जिक्र किया, जिस पर सत्ता पक्ष के सांसदों ने तुरंत विरोध जताया और हंगामा शुरू कर दिया।

वहीं कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने तंज कसते हुए कहा, “जब लोकसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक पारित हो रहा था, उसी समय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 26% शुल्क बढ़ाने की घोषणा कर दी। सरकार को यह तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकता क्या है – वक्फ कानूनों में संशोधन या देश की आर्थिक स्थिति सुधारना।”

निष्कर्ष: बिल पास, पर सियासी नाटक जारी रहेगा!

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पास हो चुका है, लेकिन असली लड़ाई अब संसद के बाहर होगी—TV डिबेट्स में, सोशल मीडिया पर और चुनावी रैलियों में। सरकार इसे “पारदर्शिता की ओर एक ऐतिहासिक कदम” बता रही है, तो विपक्ष इसे “मुसलमानों के अधिकारों पर हमला” कह रहा है।

सवाल यह नहीं है कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम होंगे या नहीं, सवाल यह है कि देश की राजनीति कब इस तरह के मुद्दों से ऊपर उठेगी? जब बेरोजगारी और महंगाई से आम जनता जूझ रही हो, तब संसद में 14 घंटे की महाभारत कर ‘कौन बोर्ड में रहेगा और कौन नहीं’—इस पर इतनी ऊर्जा खर्च करना क्या वाकई में ज़रूरी था?

सत्ता पक्ष के लिए यह बिल “न्याय और सुधार” का प्रतीक है, जबकि विपक्ष इसे “ध्रुवीकरण और सियासी गणित” का हिस्सा मानता है। लेकिन असली मुद्दा यह है कि इन बहसों से जनता को क्या मिला? शायद एक और दिन की गर्मागर्म चर्चाएं, कुछ और मीम्स और अगले चुनाव तक चलने वाले नए विवाद!

तो अब सवाल यह नहीं कि वक्फ बोर्ड में कौन रहेगा, बल्कि यह है कि देश के असली मुद्दे कब सरकार और विपक्ष की प्राथमिकता बनेंगे? जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, तब तक संसद में ऐसे नए नाटकों के लिए popcorn तैयार रखना ही बेहतर होगा!

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