
भारत सरकार ने हाल ही में नई विदेश व्यापार नीति का ऐलान किया और इसके साथ ही हर भारतीय के दिल में एक नया सपना जाग उठा—अब हम सिर्फ़ मसाले और चाय ही नहीं, बल्कि मिसाइलें और मोबाइल भी एक्सपोर्ट करेंगे! नीति का उद्देश्य है कि भारत को “निर्यात महाशक्ति” बनाया जाए, लेकिन अगर आप सरकारी घोषणाओं के दीवाने नहीं हैं, तो ये भी सोच सकते हैं—”पहले घरेलू व्यापारी रो रहे हैं, फिर विदेश में कौन हमें गले लगाएगा?”
तो चलिए, बिना किसी सरकारी प्रेस रिलीज़ की बोरियत के, इस नई नीति का चीर-फाड़ विश्लेषण करते हैं और समझते हैं कि इसमें व्यापारियों की भलाई छिपी है या सिर्फ़ “विकास की आत्मा” वाला जुमला!
1. डिजिटल व्यापार: “पेपरलेस इंडिया” या “सिस्टम डाउन इंडिया”?
नई नीति कहती है कि अब आयात-निर्यात की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल होगी। यानी व्यापारियों को किसी सरकारी दफ्तर के बाबू से भिड़ने की जरूरत नहीं होगी।
लेकिन भारत में डिजिटल सिस्टम का क्या हाल है, ये तो हर ऑनलाइन टिकट बुक कराने वाला जानता है! सरकारी पोर्टल जब तक “लोडिंग…” दिखाएगा, तब तक व्यापारी का धंधा “लोड” बनकर बैठ जाएगा। और अगर सर्वर क्रैश हो गया, तो व्यापारी का सपना भी वहीं दम तोड़ देगा।
2. ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट: “दुकान अब अमेज़न पर!”
सरकार का कहना है कि छोटे व्यापारियों को अब ई-कॉमर्स के जरिए सीधे विदेशी ग्राहकों तक पहुंचने का मौका मिलेगा। यह सुनकर हर छोटे व्यापारी को लगा कि अब वह अलीबाबा का ‘बाबा’ और ऐमज़ॉन का ‘ज़ॉन’ बन जाएगा!
लेकिन सवाल यह है कि जब भारतीय ग्राहक ही ऑनलाइन शॉपिंग में “कैश ऑन डिलीवरी” और “फ्री रिटर्न” ढूंढते हैं, तो विदेशी ग्राहक कैसे भरोसा करेंगे?
और हां, भारतीय डिलीवरी सिस्टम की स्पीड देखते हुए, अगर हम विदेश में पार्सल भेजेंगे, तो हो सकता है कि ग्राहक की जगह उसके पोते को सामान मिले!
3. टैक्स में छूट: “सरकार की कृपा, लेकिन फार्म भरकर आओ!”
सरकार ने कहा है कि निर्यातकों को टैक्स में छूट मिलेगी। यह सुनकर व्यापारियों की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन जब उन्होंने नियम और शर्तें पढ़ीं, तो वे हंसी रोक नहीं पाए!
क्योंकि यह छूट लेने के लिए 50 पेज का फॉर्म भरना होगा, फिर सरकारी बाबू से “सही करवाना” होगा, और अगर गलती से कुछ गड़बड़ हो गई, तो व्यापार छोड़कर सरकारी ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
मतलब, “बाबूगिरी से मुक्ति” का नारा लगाने वाली सरकार ने बाबूगिरी को ऑनलाइन कर दिया!
4. फ्री ट्रेड एग्रीमेंट: “हमारा माल दुनिया को मिलेगा सस्ता, लेकिन हमारा किसान?”
सरकार कह रही है कि हम दुनिया भर से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) करेंगे ताकि हमारे उत्पाद सस्ते दरों पर बिक सकें।
लेकिन किसान भाई सोच में पड़ गए—”भैया, जब सस्ता विदेशी माल इंडिया में आएगा, तो हमारा धंधा कैसे चलेगा?”
अगर भारत को अपने व्यापार की चिंता है, तो विदेशी कंपनियों को भी अपने मुनाफे से प्यार है। कहीं ऐसा न हो कि “मेक इन इंडिया” के नाम पर हम सिर्फ लेबर सप्लाई करने वाले देश बन जाएं!
5. रक्षा और टेक्नोलॉजी का एक्सपोर्ट: “बुलेटप्रूफ बनाओ, लेकिन हम खुद सुरक्षित रहें!”
सरकार ने कहा है कि अब भारत हथियार और हाई-टेक प्रोडक्ट भी एक्सपोर्ट करेगा। सुनकर देशभक्ति के गाने बैकग्राउंड में बजने लगे!
लेकिन असली सवाल ये है—जब हमारी ही सेना कई बार हमारे “मेड इन इंडिया” हथियारों पर भरोसा नहीं करती, तो विदेशी कौन खरीदेगा?
अगर विदेशों में भारतीय मिसाइल भेजी जाए और वह रास्ते में कहीं “सिग्नल लॉस्ट” हो जाए, तो क्या हम जिम्मेदारी लेंगे?
नीति का असली असर: “आत्मनिर्भर या आत्ममुग्ध?”
सरकार कह रही है कि यह नीति भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि हम “आत्ममुग्धता” की ओर बढ़ रहे हैं।
तो आइए, देखें कि असलियत क्या हो सकती है:
✅ फायदे:
✔ भारतीय व्यापारियों को नया प्लेटफॉर्म मिलेगा
✔ छोटे उद्योग भी ग्लोबल मार्केट में जा सकेंगे
✔ डिजिटल प्रक्रिया से भ्रष्टाचार में कमी आ सकती है (अगर सिस्टम ठीक से चले तो!)
❌ नुकसान:
❌ विदेशी प्रतिस्पर्धा से भारतीय उत्पादों को दिक्कत होगी
❌ सरकार की “डिजिटल” योजनाएँ कागज़ों में ही रह सकती हैं
❌ व्यापारियों को टैक्स छूट के लिए ज्यादा जद्दोजहद करनी पड़ेगी
अंत में: “महाशक्ति या महाशय?”
सरकार का सपना है कि भारत “निर्यात महाशक्ति” बने, लेकिन क्या यह हकीकत बनेगा या सिर्फ़ सरकारी विज्ञापन?
- अगर सरकार ने इसे ईमानदारी से लागू किया, तो यह नीति देश को आर्थिक ऊंचाइयों पर पहुंचा सकती है।
- लेकिन अगर यह सिर्फ़ भाषणों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित रही, तो यह नीति सिर्फ़ एक “पेपर टाइगर” बनकर रह जाएगी।
आपका क्या कहना है? क्या इस नीति से भारत सच में निर्यात महाशक्ति बनेगा या यह भी सिर्फ़ एक और “गूगल पर नंबर 1” वाला जुमला साबित होगा? अपनी राय दें!
पोपट लाल लेखन की दुनिया के वो शख्स हैं, जो शब्दों को ऐसी कलाबाज़ी खिलाते हैं कि पाठक हंसते-हंसते कुर्सी से गिर जाएं! गंभीर मुद्दों को भी ये इतनी हल्की-फुल्की भाषा में परोसते हैं कि लगता है, जैसे कड़वी दवाई पर चॉकलेट की परत चढ़ा दी गई हो। इनका मकसद बस इतना है—दुनिया चाहे कुछ भी करे, लोग हंसते रहना चाहिए!
Leave a Reply