
FSSAI: कौन हैं ये लोग और क्यों हमारी थाली में ताकझांक कर रहे हैं?
भारत में खाना सिर्फ पेट भरने का ज़रिया नहीं, बल्कि एक भावनात्मक रिश्ता है। यहाँ शादी-ब्याह हो या तेरहवीं, सबकुछ खाने के इर्द-गिर्द घूमता है। लेकिन जैसे ही आप खाने की प्लेट उठाते हैं, कोई न कोई कह देता है—“भाई, ये FSSAI Approved है क्या?” और आप सोच में पड़ जाते हैं कि समोसा खाएं या पहले इसका सर्टिफिकेट मांगें?
FSSAI यानी Food Safety and Standards Authority of India, एक सरकारी संस्था जो यह तय करती है कि आपका पनीर वाकई गाय-भैंस के दूध से बना है या फिर लैब के केमिकल्स से। यह संस्था हर खाने-पीने की चीज़ की गुणवत्ता तय करती है, लेकिन असली सवाल यह है कि यह जनता की सेहत के लिए बनी है या दुकानदारों की नींद उड़ाने के लिए?
FSSAI के नियम: होटल मालिकों की रातों की नींद, छोटे दुकानदारों की जेब पर वार!
FSSAI का मुख्य काम खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है, लेकिन अगर आप किसी ढाबे वाले से पूछेंगे, तो वह बोलेगा—“भैया, GST से ज़्यादा खतरनाक चीज़ अगर कुछ है तो वो है FSSAI लाइसेंस!”
लाइसेंस लेने का मज़ा वही जाने जिसने इसे पाने के लिए पापड़ बेले!
- पहले तो आपको लाइसेंस लेना पड़ता है, जिसमें इतने पेच होते हैं कि आपको खुद भी लगने लगता है कि आप खाना बनाने नहीं, बल्कि किसी अपराध में शामिल हो रहे हैं।
- फिर हर सामान पर FSSAI का लोगो होना चाहिए, वरना ग्राहक ऐसे शक की निगाह से देखेगा जैसे आपने उसे ज़हर दे दिया हो!
- अगर आपने नियमों की अनदेखी की, तो फूड इंस्पेक्टर आपकी दुकान पर ऐसे आ धमकते हैं जैसे CID वाले छापा मारने आए हों।
FSSAI और स्ट्रीट फूड: गोलगप्पे वाले भैया अब साइंटिस्ट बनेंगे?
अगर FSSAI के नियम सही मायनों में लागू हुए, तो गोलगप्पे, समोसे, चाट, और बिरयानी इतिहास की किताबों में मिलेंगे!
- गोलगप्पे वाले को पानी का पीएच टेस्ट करना पड़ेगा
- समोसे वाले को आलू का बैक्टीरियल एनालिसिस कराना होगा
- लस्सी वाले को दूध का फैट कंटेंट प्रमाणित करना पड़ेगा
अब सोचिए, स्ट्रीट फूड बेचने वाले भैया लैब कोट पहनकर सड़कों पर खड़े होंगे, और ग्राहक समोसे से पहले उसकी रिपोर्ट पढ़कर ऑर्डर देंगे!
सोशल मीडिया पर FSSAI की महिमा: प्लास्टिक के चावल से लेकर जहर भरी मिठाइयों तक!
आजकल सोशल मीडिया पर हर दिन कोई न कोई वीडियो वायरल हो जाता है:
- “मैगी में सीसा (Lead) है!” – पूरा देश सदमे में!
- “कोल्ड ड्रिंक्स में कैमिकल है!” – फिर भी करोड़ों लोग गटक जाते हैं!
- “मिठाइयों में डिटर्जेंट मिला है!” – अब जनता कन्फ्यूज़, इसे खाएं या इससे कपड़े धोएं?
फिर FSSAI आकर सफाई देता है कि “घबराइए मत, सब ठीक है!” लेकिन जनता अब सोच में पड़ जाती है कि विश्वास करे या फिर सिर्फ सलाद खाकर जिए?
FSSAI की अच्छाइयाँ: कहीं-कहीं ये वाकई काम की चीज़ भी है!
चलिए, मज़ाक छोड़ते हैं और कुछ फायदे भी देख लेते हैं:
- मिलावट पर रोक: FSSAI के चलते मिलावटी चीज़ों पर नकेल कसी जाती है, जिससे हमारा स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है।
- सेहतमंद खाने की गारंटी: खाने-पीने की चीज़ों में पोषण संबंधी मानक तय करने में मदद मिलती है।
- ग्राहकों की जागरूकता: अब लोग खरीदारी के समय लेबल पढ़ने लगे हैं, जो एक अच्छी बात है!
FSSAI—जनता का रखवाला या दुकानदारों का सिरदर्द?
FSSAI की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके नियम इतने पेचीदा हैं कि छोटे दुकानदारों के लिए इससे निपटना किसी युद्ध से कम नहीं। आम आदमी को बस इतना ध्यान रखना है कि FSSAI का लोगो देखकर सामान खरीदें और अगर कोई गड़बड़ी लगे, तो सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने की जगह सीधे शिकायत करें!
तो अगली बार जब आप गर्म-गर्म समोसे खा रहे हों, तो यह मत सोचिए कि FSSAI Approved है या नहीं, बस यह देखिए कि कुरकुरा है या नहीं!
पोपट लाल लेखन की दुनिया के वो शख्स हैं, जो शब्दों को ऐसी कलाबाज़ी खिलाते हैं कि पाठक हंसते-हंसते कुर्सी से गिर जाएं! गंभीर मुद्दों को भी ये इतनी हल्की-फुल्की भाषा में परोसते हैं कि लगता है, जैसे कड़वी दवाई पर चॉकलेट की परत चढ़ा दी गई हो। इनका मकसद बस इतना है—दुनिया चाहे कुछ भी करे, लोग हंसते रहना चाहिए!
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