
भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर हर किसी के मन में एक ही सवाल है—“कहां जा रही है भाई?”
सरकार कह रही है कि “अच्छे दिन आएंगे”, लेकिन आम आदमी देख रहा है कि अर्थव्यवस्था की गाड़ी चल तो रही है, पर कभी मंदी का गड्ढा, कभी बेरोज़गारी का ट्रैफिक जाम, और कभी महंगाई का टोल प्लाज़ा—हर जगह रुकावट ही रुकावट!”
तो चलिए, बिना किसी सरकारी प्रेस नोट और एक्सपर्ट के भारी-भरकम शब्दों के, समझते हैं कि भारत की दीर्घकालिक आर्थिक विकास दर क्यों गिर रही है और इससे निकलने का रास्ता क्या है?
1. नौकरी या नौका? युवा सोच रहा, जॉब से बेहतर खुद का धंधा!
जब देश के करोड़ों युवा रोज़गार की तलाश में दर-दर भटक रहे हों और सरकार स्टार्टअप्स को प्रमोट कर रही हो, तो सवाल उठता है—“रोज़गार दे कौन रहा है?”
सरकारी दफ्तर कहते हैं—”सरकारी नौकरी मत सोचो, प्राइवेट में जाओ!”
प्राइवेट कंपनियां कहती हैं—”हमारे पास AI और ऑटोमेशन है, हमें इंसानों की जरूरत नहीं!”
नतीजा? युवाओं ने सरकारी नौकरी का सपना छोड़ दिया और अब खुद का बिज़नेस करने की सोच रहे हैं।
लेकिन बिज़नेस में भी GST का जंजाल, सरकारी अफसरों का प्यार और बैंक लोन की तमन्ना ऐसी है कि कई लोगों का स्टार्टअप बनने से पहले ही “शटडाउन” हो जाता है।
तो अगर बेरोज़गारी की ये हालत रही, तो भविष्य में हमारे पास दो ही ऑप्शन होंगे—या तो नौकरी ढूंढो, या फिर नौकरी ही खत्म कर दो!
2. मंहगाई: पैसा बहुत कमाने के बाद भी गरीब क्यों लग रहे हैं?
सरकार कह रही है कि देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है और हर नागरिक की आय बढ़ रही है। लेकिन जब आम आदमी अपने पर्स की ओर देखता है, तो उसे महसूस होता है कि पैसा आता तो है, लेकिन रुकता नहीं!
- पेट्रोल का दाम: लगता है कि अब आम आदमी को अपनी साइकिल निकालनी पड़ेगी!
- सब्ज़ी के दाम: अब आलू-प्याज़ भी VIP हो गए हैं!
- दवाईयों के दाम: बीमार पड़ना भी अमीरों का शौक हो गया है!
और ये सब तब हो रहा है, जब सरकार कह रही है कि मुद्रास्फीति नियंत्रण में है। अब जनता सोच रही है कि अगर ये नियंत्रण में है, तो भगवान ही बचाए जब ये नियंत्रण से बाहर होगी!
3. बैंक लोन: जो ज़रूरतमंद है, उसे नहीं मिलता, जो भागने वाला है, उसे करोड़ों!
भारत में बैंक लोन लेने का तरीका बहुत मज़ेदार है। अगर आप एक ईमानदार आम आदमी हैं, तो बैंक वाले आपसे इतने कागज़ मांगेंगे कि आपको लगेगा कि आप बैंक से लोन नहीं, बल्कि शादी के लिए लड़की मांग रहे हैं!
लेकिन अगर आप एक बड़े उद्योगपति हैं, तो बैंक वाले खुद आकर कहेंगे—”साहब, बस दस्तखत कर दीजिए, बाकी लोन हम दे देंगे!”
और फिर वही उद्योगपति किसी दिन अखबार की सुर्खियों में दिखता है—”हजारों करोड़ लेकर विदेश फरार!”
अब सवाल ये है कि अगर पैसा देश में रहेगा ही नहीं, तो विकास होगा कैसे?
4. कृषि क्षेत्र: किसान आत्मनिर्भर बना या आत्महत्या कर रहा है?
सरकार ने किसानों के लिए कई योजनाएं निकालीं, MSP भी बढ़ाया, डिजिटल मंडियां भी बनाई, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसानों की जिंदगी बदली?
क्योंकि—
- फसलों के दाम किसान नहीं, बल्कि बिचौलिए तय करते हैं।
- बारिश और मौसम भगवान के हाथ में है, और बीमा कंपनियां मुआवजा देने में आलस कर रही हैं।
- लागत इतनी बढ़ गई है कि खेती अब लाभ का सौदा नहीं, बल्कि घाटे का खेल बन गई है।
अब किसान समझ नहीं पा रहा कि वह “आत्मनिर्भर भारत” में आत्मनिर्भर बन रहा है या आत्महत्या के आंकड़ों में योगदान दे रहा है!”
5. शिक्षा और कौशल विकास: डिग्री तो है, लेकिन नौकरी के लिए अनुभव चाहिए!
भारत में शिक्षा ऐसी है कि इंजीनियरिंग करने के बाद भी लोग कोडिंग सीखने के लिए अलग से कोर्स कर रहे हैं, और एमबीए करने वाले सेल्समैन बन रहे हैं।
कॉलेज वाले कह रहे हैं—”हमने पढ़ाया!”
कंपनी वाले कह रहे हैं—”एक्सपीरियंस चाहिए!”
युवा कह रहे हैं—”भाई, एक्सपीरियंस आएगा कहां से?”
तो जब तक हमारी शिक्षा प्रणाली सिर्फ़ डिग्री बांटने में व्यस्त रहेगी और इंडस्ट्री की ज़रूरतों के हिसाब से नहीं बदलेगी, तब तक बेरोज़गारी बढ़ेगी और आर्थिक विकास की रफ्तार घटेगी!
6. विदेशी निवेश: FDI आ रहा है या जा रहा है?
सरकार कह रही है कि भारत में विदेशी निवेश बढ़ रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत देखिए—
- कई विदेशी कंपनियां भारत से अपना बैग पैक कर चुकी हैं।
- “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” सिर्फ़ रिपोर्ट में बढ़ रहा है, लेकिन हकीकत में बिज़नेस खोलना उतना ही मुश्किल है।
- निवेशक कहते हैं कि नीतियां हर महीने बदलती हैं, स्थायित्व नहीं है!
तो जब विदेशी निवेशक खुद कन्फ्यूज हैं कि भारत में पैसा लगाएं या नहीं, तो अर्थव्यवस्था की हालत भी कन्फ्यूजिंग बनी रहेगी!
अब समाधान क्या है? “बाबू नहीं, बिज़नेस चाहिए!”
अगर भारत को आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ानी है, तो नीचे दिए गए बिंदुओं पर ध्यान देना होगा:
1. रोज़गार सृजन:
सरकार को ऐसी नीतियां लानी होंगी जिससे नौकरियां पैदा हों, सिर्फ़ भाषण नहीं।
2. महंगाई पर नियंत्रण:
टैक्स का बोझ कम किया जाए, ताकि पेट्रोल, दवाइयां, और रोजमर्रा की चीजें सस्ती हो सकें।
3. बैंकिंग सुधार:
बैंकों को छोटे व्यापारियों और किसानों को लोन देना चाहिए, न कि सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को।
4. कृषि क्षेत्र को मज़बूत करना:
किसानों को बिचौलियों से मुक्त करना होगा और फसलों के दाम किसान के हिसाब से तय होने चाहिए।
5. शिक्षा प्रणाली में बदलाव:
कोर्स ऐसे हों जो इंडस्ट्री की ज़रूरतों के हिसाब से हों, ताकि युवा पढ़ाई के बाद सीधे नौकरी पा सकें।
6. नीतियों में स्थायित्व:
सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो हर साल न बदलें, ताकि विदेशी निवेशकों का भरोसा बना रहे।
निष्कर्ष: गाड़ी आगे बढ़ेगी, लेकिन ड्राइवर को सतर्क रहना होगा!
भारत की आर्थिक विकास दर गिर रही है, लेकिन अगर सही कदम उठाए जाएं, तो यह रफ्तार फिर से बढ़ सकती है।
अब देखना ये है कि सरकार वाकई में कुछ करती है या सिर्फ़ अगले चुनाव के लिए नया नारा गढ़ती है?
तो, आपका क्या कहना है? क्या भारत सच में आर्थिक सुपरपावर बनेगा, या फिर सिर्फ़ “GDP ग्रोथ” वाले आंकड़े अखबारों में छपते रहेंगे?
पोपट लाल लेखन की दुनिया के वो शख्स हैं, जो शब्दों को ऐसी कलाबाज़ी खिलाते हैं कि पाठक हंसते-हंसते कुर्सी से गिर जाएं! गंभीर मुद्दों को भी ये इतनी हल्की-फुल्की भाषा में परोसते हैं कि लगता है, जैसे कड़वी दवाई पर चॉकलेट की परत चढ़ा दी गई हो। इनका मकसद बस इतना है—दुनिया चाहे कुछ भी करे, लोग हंसते रहना चाहिए!
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