
आज का दिन भी अन्य दिनों की तरह ही शुरू हुआ था। लोग अपनी-अपनी ज़िंदगी की ऊटपटांग परेशानियों में उलझे हुए थे। कोई बैंकॉक की चमचमाती सड़कों पर ट्रैफिक से जूझ रहा था, तो कोई म्यांमार में चाय की चुस्कियों के साथ लोकतंत्र पर लंबी बहस कर रहा था। लेकिन फिर अचानक, प्रकृति ने सोचा – “क्यों न आज इंसानों को थोड़ा हिलाकर रख दिया जाए?” और देखते ही देखते ज़मीन ने ऐसा थरथराना शुरू कर दिया कि लोग झूलों का मज़ा लेने लगे, मगर बिना टिकट!
म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र में जब धरती की कोख से 7.7 तीव्रता का भूकंप निकला, तो यह सिर्फ ज़मीन के अंदर की हलचल नहीं थी, बल्कि एक चेतावनी थी – “बंदे! तूने जो ऊंची-ऊंची इमारतें बनाई हैं, उन पर ज्यादा घमंड मत कर। बस एक झटका और सब धूल में मिल सकता है!” बैंकॉक के आसमान को चूमती गगनचुंबी इमारतें भी इस बात से सहमत होती दिखीं, क्योंकि वे भी अचानक हिलने लगीं। कोई लहरा रहा था, तो कोई सिर पकड़कर बैठ गया। होटल, मॉल, अपार्टमेंट्स – सबके सब डोलने लगे, जैसे किसी ने उनकी नींव में बैले डांस डाल दिया हो।
इस भूकंप का असर सिर्फ बैंकॉक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि म्यांमार की पुरानी ऐतिहासिक संरचनाओं ने भी इस अवसर पर धरती से थोड़ी नज़दीकी बढ़ाने का फैसला किया। मांडले में बने सैकड़ों साल पुराने पगोडा और बौद्ध मंदिर धराशायी हो गए। लगा जैसे उन्होंने भी कह दिया हो – “भाई, अब बहुत हो गया, हमें भी थोड़ा आराम चाहिए।”
बैंकॉक में तो अफरा-तफरी मच गई। लोग अपने-अपने दफ्तरों से बाहर भागे, कोई अपने बॉस से बचने के लिए नहीं, बल्कि सच में जान बचाने के लिए। शहर की मेट्रो ट्रेनें रुक गईं, और सोशल मीडिया पर वीडियो की बाढ़ आ गई। हर कोई अपना-अपना अनुभव साझा कर रहा था, मानो यह कोई नया ट्रेंडिंग चैलेंज हो – “#EarthquakeChallenge – क्या तुम बिना डगमगाए खड़े रह सकते हो?” वहीं, कुछ खास घाघ टाइप लोग भी थे, जिन्होंने इसे मौके के रूप में देखा और लाइव वीडियो बनाकर लाइक्स और फॉलोअर्स बटोरने में लग गए।
म्यांमार की स्थिति और भी भयावह थी। वहां की सरकार को तो वैसे ही रोज़ नए सरदर्द रहते हैं, लेकिन इस बार यह सरदर्द सच में सिर के ऊपर से निकल गया। सागाइंग और मांडले के बीच पुल टूट गए, सड़कें चटक गईं और लोग अपने घरों से निकलकर खुले आसमान के नीचे आ गए। वैसे भी वहां की जनता सरकार से ज्यादा भरोसा प्रकृति पर करती है, और इस बार प्रकृति ने भी कह दिया – “बेटा, सरकार तो तुम्हारी वैसे भी हिलती रहती है, अब ज़रा धरती भी हिलाकर देख लो।”
भूकंप का असर बैंकॉक में इतना जबरदस्त था कि कई ऊंची इमारतों में क्रैक आ गए। एक निर्माणाधीन इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई और अफसोसजनक रूप से इसमें कई लोगों की जान चली गई। बैंकॉक की सरकार हरकत में आई और प्रधानमंत्री पैतोंगटार्न शिनावात्रा ने तुरंत बचाव कार्य शुरू करवाया। लेकिन, जैसा कि होता है, बचाव कार्य और सरकारी मदद की गति हमेशा कछुए से भी धीमी होती है, और लोग अपने दम पर ही मलबे से बाहर निकलने की कोशिश करते दिखे।
इस बीच, भारतीय उपमहाद्वीप भी इस हलचल से अछूता नहीं रहा। दिल्ली, कोलकाता और गुवाहाटी तक हल्के झटके महसूस किए गए। दिल्ली में बैठे लोग वैसे ही अक्सर अपने घरों की EMI से कांपते रहते हैं, लेकिन इस बार सच में जमीन हिली तो सबको लगा कि शायद मकान मालिक EMI बढ़ाने की चेतावनी दे रहा है। कुछ लोग भागकर खुले मैदानों में चले गए, तो कुछ ने अपनी दीवारों की दरारों को देखकर कहा – “अरे! ये तो पिछले भूकंप का निशान था, इस बार तो नया कुछ दिख ही नहीं रहा!”
भूकंप के बाद हमेशा की तरह वैज्ञानिकों ने बयान दिया कि यह टेक्टोनिक प्लेट्स की हलचल का परिणाम था। यानी कि धरती के नीचे प्लेटें आपस में खिसक रही थीं और इंसानों को झटका दे रही थीं। अब भई, जब आप अपनी प्लेट से दूसरी प्लेट पर बिना पूछे हाथ बढ़ाओगे, तो लड़ाई तो होगी ही! बस, यही गड़बड़ धरती के अंदर भी हो गई और उसका असर ऊपर दिखा।

लेकिन असली सवाल तो यह है कि इस घटना से हमने क्या सीखा? क्या हम अपनी इमारतों को और मजबूत बनाएंगे? क्या हम प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए और तैयार रहेंगे? नहीं, बिल्कुल नहीं! हम वही करेंगे जो हर बार करते हैं – दो दिन तक इस पर बहस करेंगे, सोशल मीडिया पर मीम बनाएंगे, कुछ मंत्रियों के बयान सुनेंगे और फिर अगले ब्रेकिंग न्यूज का इंतजार करेंगे।
अंत में, यह भूकंप हमें यह याद दिलाने आया था कि इंसान चाहे जितना भी बड़ा इंजीनियर बन जाए, चाहे कितनी भी ऊंची इमारतें बना ले, लेकिन जब धरती को हिलने की सूझती है, तो सारी टेक्नोलॉजी धरी की धरी रह जाती है। और वैसे भी, हम इंसान अपने अहम में इतने डूबे रहते हैं कि हमें कभी-कभी याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि असली बॉस कौन है – हम या प्रकृति? जवाब आप खुद ही सोच लीजिए!
पोपट लाल लेखन की दुनिया के वो शख्स हैं, जो शब्दों को ऐसी कलाबाज़ी खिलाते हैं कि पाठक हंसते-हंसते कुर्सी से गिर जाएं! गंभीर मुद्दों को भी ये इतनी हल्की-फुल्की भाषा में परोसते हैं कि लगता है, जैसे कड़वी दवाई पर चॉकलेट की परत चढ़ा दी गई हो। इनका मकसद बस इतना है—दुनिया चाहे कुछ भी करे, लोग हंसते रहना चाहिए!
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